Monday, April 23, 2007

चाँद ग्रहण में आखें

चाँद ग्रहण की रात में,
झुलसे हुए चाँद की,
शीतल रोशनी बुझी सी लगती थी.
ग्रहण में चाँद की क्या ग़लती थी?

बिस्तर किनारे नींद खड़ी थी,
चादर का कोना पकड़ कर.
takiye पर जगह के इंतज़ार में!
पूरी रात जगह ना मिली उसको.
इसमें आखों की क्या ग़लती थी?

रात गुज़री खुली आँखों में!
बची खुचि रोशनी साथ लेकर,
चाँद निकला सुबह के सफ़र पे,
शायद सूरज की रोशनी में, अपना
ग्रहण से झुलसा चेहरा छुपा सके.

रात भर किनारे खड़ी नींद,
थक कर बोझील क़दमों से मुड गयी.
स्याह रात के बाद, सुबह का सूरज,
थकी आँखों में रोशनी भर गया.

नया धुला आसमान देख कर,
आँखों ने भी पर फैलाए.
लंबी उड़ान पैर निकल पड़ी,
नयी मंज़िलों के सपने लिए!!

Tuesday, April 3, 2007

Movie/Cricket match aur dosti


Snippets

बस प्यार करने से ही तो शायरी नही आती
बात तो बस एक दर्द समझने भर की है


हम ज़िंदा, और
ज़िंदगी परिंदा है

हर कोई ख़ुद के ग़म को बड़ा समझ, जिए चला गया
एक मैं था जिसे सबके आगे अपने ग़म छोटे लगते रहे.


एक तेरी ख़ैर मनाते शब गुज़र गयी
तुम आए शब्बा ख़ैर करके निकल गये


तेरे जवाब का इंतज़ार कुछ ज़्यादा लंबा था,
तू बुत बन गया, हमारी ज़िंदगी निकल गयी

इंतज़ार का दर्द ना कभी मोल लेना
उमर निकल जाएगी, दवा ढूँढे ना मिलेगी.