Thursday, May 24, 2007

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इस तरह जीने का माद्दा सब मे नही होता
गर होता युं तो हर कोई मसख़रा होता

हमने
मुस्कुरा कर देखा दोस्तों को
उसी में बदले दोस्तों के मिसाज़
क़त्ल का इल्ज़ाम लगाया हम पर
और ख़ुद ही हो चले नाराज़.

याद की लहरों में गोते लगा रहे थे,
जब हक़ीक़त ने साहिल पे ला पटका!
दामन हमसे छुड़ा कर,
सपना लहरों में बह निकला!!

गुमनाम मक़सद

गुमनामी से तुम उठ जाना!!
कुछ पंख लगा कर उड़ जाना !!

उन इंद्रधनुषी रंगो को,
पँखो में भर कर ले आना.

फिर रंग भरे उन पँखो से,
हल्के से मुझे तुम छू जाना.

कुछ ऐसा करना तुम जादू,
सपनो को पंख लगा जाना.

रंग भरे उन सपनो को,
मक़सद जीने का बना जाना!!

बदलते मौसम

हम जब भी मिलते थे!!
मौसम बदलते थे!!

सूरजमुखी भी देखकर हमें
रुख़ अपना बदलते थे

भरी गर्मी की दोपहरी में ,
बिन मौसम बादल घूमड़ते थे.

छुपन-छुपाई खेलते भ्वरे
आँचल मेरा पकड़ते थे.

देख कर इतने दीवाने तुम,
कैसे मन में जलते थे!!

गिलहरियाँ शर्मा कर छुप जाती थी,
जब तुम हाथ मेरा पकड़ते थे.

पेड़ भी हवा से कुछ,
फुसफुसा कर बात करते थे

पुरज़ोर कोशिश तेरी देर तक रोकने की,
मना करने पर कितना मचलते थे

चाँदनी से रोशन माखमली ज़मीन पर
हम रात भर जाग कर बात करते थे.

पर ना जाने कहा वो मौसम चले गये!!
हालातो की मार से मौसम भी बदल गये