Tuesday, July 17, 2007

सुनी सी अनकही


तेरे लब भी ना हिला किए
फिर भी हम सब सुना किए
बस अंदाज़--बयान और था
तेरे कहने का, मेरे सुनने का

बहते हुए लम्हे

किनारे बैठे हुए, पानी में पैर डाले,
कुछ लम्हे पकड़े हमने बहते हुए

फूल से हल्के थे कुछ, नरम पंखों से,
के डर लगता था उन्हे छूते हुए.

कुछ पल की देरी और कुछ मिजाज़ बदले से होते,
तो हम देखते उन्हे, भंवर में फ़सते हुए.

ना जाने कहाँ से बहे आ रहे थे,
वक़्त के थपेड़े सहते हुए.

मुट्ठी में पकड़ कर, सोचा शाम सजायें,
छन
गये मुट्ठी से वो, बस ये कहते हुए.

हमें ना थाम यूं, ना कर बदनाम यूं
हमें जाना है ज़िंदगियाँ
बुनते हुए

Thursday, July 12, 2007

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कब सावन आएगा !!!
छुपकर रोने को जी चाहता है

मसख़रा बन गाये
जिस दिन दर्द की इंतिहा देखी

खंजर चला कर वो
पूछते हैं ख़ैरियत मेरी.

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 सोचता हूँ, तेरी आँखों का रंग नीला ना होता तो क्या होता!!
आसमान का रंग नीला ना होता तो क्या होता!!
पानी का रंग नीला ना होता तो क्या होता!!
आँसू ना बहने देना आँखों से, वो नीले रंग को बहा ले जाएँगे
आसमान और पानी के रंग फिर कहाँ से आएँगे
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बात ना हो पाने की शिकायत है एक दोस्त को
दूसरे को हालात पूछने पर भी ऐतराज़ है
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सब दुहाई देते हैं प्यार की
सब कसमें खाते हैं प्यार की
कैसे बयान करें,
हम रुसवाइयाँ प्यार की
ज़माने ने जो सितम किए सो किए
यार ने भी क़ीमत माँग ली प्यार की

Memoirs

वो दादी का सर में तेल लगाना
चंपी करके, देर तक बाल बनाना
दोपहर में तहरी की ख़ूश्बू
खाना धूप के रु-ब-रु
वो ना नहाने के बहाने
क्या कभी वापस आएँगे
वो गुज़रे ज़माने!!