Sunday, January 20, 2008

'wo'

पूछा किसी ने, 'वो' क्या करते हैं? हमने कहा शायरी.
फिर पूछा उसने, और आप? हमने कहा 'उनसे' लड़ाई.
हैरान हो पूछा फिर उसने.. पर क्यों?
'उनसे' लड़ाई का आलम अब क्या पूछिए..
हम ख़फा हुए जाते हैं, वो शेर पढ़े जाते हैं.

ek masoom khayal

लगा आहट हुई, बाहर कोई आया है,
शायद किसी ने दरवाज़ा खटखटाया है

झाँका तो, अलाव की आग बुझी हुई थी
पास में ठीठूरति सी शाम खड़ी थी!
कंपकपांती शाम पूरी भीगी हुई थी
शायद नदी में फिसल पड़ी थी.

अंदर लाकर उसको जब बैठाया,
उपर मोटा सा कंबल ओढाया!
हाथ में गरम चाय का कप थमाया
तब उसने अपना क़िस्सा सुनाया

मीठी धूप में घूमने निकली थी
शहर और लोगों को देखने
किसी का हाल चाल पूछने
और थोड़ी सी धूप सेकने

नदी किनारे मंदिर के पास से गुज़री
तो टूटी हुई नाव पर बैठी उम्र मिली
नाव के छेद, पेड़ की छाल, चेहरे की झुरियाँ
हर चीज़ पर जैसे वही बिखरी थी

बिखर रहा था उसका गुमान
नदी कैसे आज भी है जवान?
सफ़र में तो शुरू से साथ थी
फिर बस मैं ही कैसे बूढ़ा गयी?

कमअक्ल उम्र नही समझी
नदी तो है रोज़ रोज़ मरती
वो दिल है जिसने जवान रखा है,
सीने में क्या कुछ छुपा रखा है.

करके शुक्रिया उन्हे, आगे बढ़ी जब
यकायक एक पार्क में नज़र पड़ी तब
उम्र का दूसरा चेहरा ठ्हाके लगा रहा था
ज़िंदगी को अपनी उंगलियों पर नचा रहा था.

अपनी मुस्कुराहट छुपा कर
तुमसे मिलने आ रही थी,
तेरे ख़यालों में गुम होकर,
मन ही मन गुनगुना रही थी.

तभी गीली रेत पर पैर फिसला
और मैं नदी में गिर पड़ी
ठंडे ठंडे पानी में भीग कर
बँध गयी मेरी कूड़कुड़ी.

इसके साथ खिलखिलाती हँसी उसकी थम गयी,
मुझसे नज़र मिला , पैर के अंगूठे पर जम गयी.
कब वक़्त बीत गया, पता ही नही चला.
रात ने भी शाम का रंग बदला

भीगी गुलाबी शाम, स्याह रात हो गयी
कल की गुनगुनी धूप के सपने लिए
गरम कंबल और तकिये के सहारे
नींद के आगोश में सो गयी.

tajmahal aur ishq

कैसे तुझे ताजमहल कहें हम , मुआ मज़ार ही तो है
एक दीवाने बादशाह के इश्क़ का खुमार ही तो है.
हाथ कट्वा दिए मज़लूमों जिसे बनवाने के बाद,
क्या इश्क़ की याद रखी है किसी के जाने के बाद.
ताज का वजूद पैदा हुआ किसी के जुनून में
क्या दुआ दी होगी उसको भी हुज़ूम ने

इश्क़ तो खुदा जैसा है, ज़ाहिर नही होता
किसी मज़हब में मुज़ाहिर नही होता
छुपा है हम में बस खुदा जैसे
क्यों दिखावे किए जाते हो ऐसे वैसे