Tuesday, April 22, 2008

दरख़्त की ख्वाइश और यीशू


एक दरख़्त की थी ख्वाइश,
उठे ऊँचा वो सबसे!!
एक दिन खुद को देखा उसने
खुदा को संभाले हुए.

सबसे ऊँचा उस दिन वो था,
खुद खुदा था ले कर चला.
ख्वाइश पूरी होने पर भी,
उसके अंदर खुशी ढली थी.

पशेमान ख्वाइश पर अपनी,
और रोया देख कर किस्मत.
खुदा उसका सहारा लिए था
कैसे माँगे उससे रहमत!!

सोचो क्या माँगते हो!!
हर रोज़ तुम खुदा से??
क्या पता किस सूरत में,
वो ख्वाइश पूरी कर दे!!

Khud hee par..

बहुत दिन हुए, के पतझड़ नही बीता;
बड़े दिनो से है मन भी मेरा रीता ;
कब से पुरवा ने भी इधर रुख़ नही किया;
के धूप में है मन मेरा जला किया.

बरखा भी बरसती नही है
मृगतृष्णा है के हटती नही है
ख्वाबों पे जम गयी है बर्फ सी
ना आती है जां ना है निकलती

ज्यों ज्यों बर्फ की परतें बढ़ती हैं
ख्वाबों पर बोझ बदता जाता है
अपने ही पाँव बोझिल लगते है
अपना ही दिल भर सा आता है

एक किरण चमकी है आज कहीं
एक बयार चली है सासों में
मुझको भी जीना है कहकर
एक ख्वाब जगा है परतों में

बच्चा सा है ख्वाब मेरा
ऐसे तो नही घबराएगा
कुछ बदमाशी करके वो भी
रीता सा मन भर जाएगा