Saturday, May 31, 2008

उनसे मुलाक़ात..



कल
शाम मिले थे हम उससे
जिसका नाम छुपाते हैं सबसे
आया था वो मिलने हमसे
बता कर सबको झूठे किस्से

सोच कर उससे मिलने की बात
काँप काँप जाते थे हाथ
ज्यों ज्यों वक़्त करीब आता
शरम से चेहरा सुर्ख हो जाता

शाम जब निकले हम घर से
छुपते से चले थे हर नज़र से
सब नज़रें हम पर ही टिकी थी
बस उसकी नज़र की कमी थी

गुल्मोहर के नीचे बेंच पर
बेचैनी में हर दो मिनट पर
खुद को रहे सँवारता
ऐसे मेरी राह निहारता

ज्यों ही करीब आए हम
सूरज को गयी शरम
वक़्त से पहले ही मुआ ढल गया
शाम को रात में बदल गया

चाँद जैसे जैसे उपर उठने लगा
'वो' हमसे मुह फूला रूठने लगा
"अब तुम जाने की ज़िद करोगी
मेरी तुमको परवाह ना होगी"

कहीं हो ना जाए रुसवाई,
ये सोच मैं उसे रूठा छोड़ आई
बिगड़ी ये बात बनाऊँ सोचती हूँ
कैसे उसे मनाऊँ सोचती हूँ.

Sunday, May 25, 2008

फिर..!!!


फिर एक वादा उसका,
फिर एक इंतज़ार मेरा
फिर टूटना वादा उसका,
फिर रोना ज़ार ज़ार मेरा
फिर खामोशी हर सवाल पर
और रह जाना मन मार मेरा

फिर चलना सड़क किनारे
अच्छा लगता था साथ तेरा
फिर तेरा हंसाना मुझको
और हँसी में छिपा प्यार मेरा

क्या सुनी कभी तूने धड़कन ?
क्या सुना कभी इनकार मेरा?
क्या सुनता था तुमको कभी!!
इनकार में छिपा इकरार मेरा

अब ना कोई वादा होगा,
ना होगा कोई इंतज़ार
ना होगा कोई सवाल
ना हसरत जवाब की
फिर ना होगा कोई
शिकवा बार बार मेरा!!!

Saturday, May 24, 2008

आख़िरी....

हर पल गुजरती जिंदगी
ना जाने क्या पल आख़िरी हो!!

हर साँस बीतती यूँ लगे
ना जाने कौन दम आख़िरी हो!!

रफ़्तार से चलता सब कुछ
ना जाने कौन सा कदम आख़िरी हो!!

परछाई भी रोशनी तक साथ देती है
ना जाने कब रोशनी आख़िरी हो!!

कहानी यूँ लिखती जा रही हूँ
ना जाने कौन कलाम आख़िरी हो!!

विराम चिन्हो से भरा एक काग़ज़
ना जाने कौन सा विराम आख़िरी हो!!

तेरे हर हरफ़ को सहेजा मैने
ना जाने कौन सा पयाम आख़िरी हो!!

हर चेहरे से मिली यूँ सफ़र में
ना जाने कौन सा सलाम आख़िरी हो!!!

तेरे लिए..

तेरी बंद आँखों के पीछे, जो चलता है बता दे
के आँखों में तेरे सपने जगाना चाहती हूँ

तेरे
ख्वाबों तक धूप तो पहुँचने दे,
के ख्वाबों से तेरे धूल हटाना चाहती हूँ

अपने अरमानों कि तहें खोल कर तो देख
के तेरे अरमानों में ज़ज्बात बहाना चाहती हूँ

अपने घर कि दरों दीवारों से भी पूछ ले
के मैं तेरा घर सजाना चाहती हूँ

जीवनपर्यंत..

खुश्बू में लिपटे,
दो पल उनीन्दे
इक पल में क़ैद तुम
इक पल में क़ैद मैं

तेरा पल ढूँढे है,
लम्हा चाहत का
मेरा पल ढूँढे है,
लम्हा राहत का

पल तेरा कस्तूरी मृग,
पगलाया सा फिरता है
पल मेरा इक सूखा त्र्न,
यहाँ वहाँ गिरता है

तुझे क़ैद कर खुद में,
वो जंगल जंगल घूमे है
मुझे क़ैद कर मेरा पल
तेरी चाहत में झूमे है

निर्झर बहता जब भी वो
कल कल झरने सा लगता
फिर दूजे पल बादल बन कर
पुरवा संग उड़ता फिरता

मिल जाएगा पल तेरा जब
मेरे इस दीवाने पल से
कहाँ ढूढ़े था इक लम्हा,
पा जाएगा कितने लम्हे

बदलते मतलब..

वो सफ़र याद है!!! जब तुम थे, मैं थी और थी बातें
ना जाने किसकी बातें, ना जाने कितनी बातें!!

बातें - वो जो कही तूने, सुनी मैने
फिर वो - जो सुनी तूने कही मैने
बाकी - ना तूने कही ना मैने
बस सुनी दोनो ने चुप्पी में

शायद, दबी खामोश सी चुप्पी
सबसे ज़्यादा बोलती है
बिन आवाज़ किए ही वो
सारे राज़ खोलती है

आज की शाम एक और सफ़र में बीतती है
पर चुप्पी हमारे बीच अब, कानो को बींधती है!!!

बेनाम----

हमकदम चले कुछ कदम चले,
कुछ कहा नही बस कदम मिले!
ज़मीन थी सब ओर झूमती
आसमाँ बहता कदमों तले

वो शाम गुज़री कुछ इस तरहा
रुक जाए सब--- दिल ने चाहा
रुके वक़्त, धड़कन, अहसास.
पर वक़्त!! कब किसका हुआ ख़ास!!!!

तू मिला, तो कुछ दिया ही होगा!!
तूने भी, वो वक़्त जिया ही होगा!!
देती क्या, मांगती उससे!!
उस पल में जी गयी जैसे.

ना ठहरा वक़्त, ना उसका साथ
कुछ पल में सब बदल गयी बात
तू मोड़ मुड़ने से पहले मिला
शायद था किसी लम्हे का सिला

कल सोचती थी शाम फिर से
तो शब्द काग़ज़ पर गिरे
शब्द ना समझे, कोई अहसास
वो तो लेते नही हैं साँस!!

पर दिल तो धड़कता है
और आवाज़ भी करता है
खूबसूरत है कितना
शब्द विहीन आवाज़ सुनना

धीमा मद्धम संगीत सुनाती
आवाज़, शहद सी घुल जाती
आज वो आवाज़ डूब गयी
मानो तक़दीर हमसे ऊब गयी