Sunday, June 29, 2008

रंजिश ही सही

मौलिक रूप से ये ग़ज़ल जानी और पहचानी जाती है मेहन्दी हसन साहब की आवाज़ में. कहा तो यहाँ तक जाता है कि उनसे बेहतर ये ग़ज़ल किसी और कि आवाज़ में नही लगी! पर शायद कुछ ख़याल होते हैं जो अपनी खूबसूरती बरकरार रखते हैं, मुद्दत बाद भी!
मेंहदी हसन साहब के बाद ग़ुलाम अली और रूना लैला ने भी इस ख़याल को अपने अपने अंदाज़ से गाया, और इसकी खूबसूरती को निखारा! यहाँ चूँकि बात चल रही है "बेहतरीन ग़ज़लें - गायिकाओं कि आवाज़ों में" इसलिए रूना लैला के अंदाज़ और आवाज़ में यहाँ पोस्ट कर रहे हैं!

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिया
फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए
रंजिश ही सही...

पहले से मारासिम सही, पर फिर भी कभी तो
रस्मो रहे दुनिया ही निभाने के लिए
रंजिश ही सही...

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझसे खफा है तो ज़माने के लिए
रंजिश ही सही...

कुछ तो मेरे पिदर--मोहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए
रंजिश ही सही...

एक उम्र से हूँ लज़्जत--गिरिया से भी महरूम
राहते जां मुझको रुलाने के लिए ..
रंजिश ही सही...

कहते हैं मुहब्बत का छुपाना है मुहब्बत
तू भी तो कभी मुझसे जताने के लिए
रंजिश ही सही...

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गायिका - रुना लैला

Friday, June 27, 2008

आज जाने की ज़िद ना करो...

आज जाने की ज़िद ना करो
यूँ ही पहलू में बैठे रहो
हाय मर जाएँगे, हम तो लुट जाएँगे
ऐसी बातें किया ना करो..

तुम ही सोचो ज़रा क्यों ना रोकें तुम्हें
जान जाती है जब, उठ के जाते हो तुम
तुमको अपनी कसम, जाने--जां
बात इतनी मेरी मान लो..
आज ही जाने की ज़िद....

वक़्त की क़ैद में ज़िंदगी है मगर
चन्द घड़ियाँ यही हैं जो आज़ाद है
इनको खो कर मेरी जाने--जां
उम्र भर ना तरसते रहो...
आज जाने की ज़िद...

कितना मासूम--रंगीन है ये समाँ
हुस्न और इश्क़ की आज मैराज है
कल की किसको खबर जां--जां
रोक लो आज की रात को...
आज जाने की ज़िद...



गायिका- फ़रीदा ख़ानम (मल्लिका--ग़ज़ल)

Thursday, June 26, 2008

पुलिंदा ..

हस्रतों का एक पुलिंदा.
कोने में पड़ा है!
जालों के नीचे, धूल की परतों में,
खुद की परतों में , कहानियाँ छुपाए!
परिक्रमा एक शहर की!
उनींदी आखें, बेहिसाब बातें!
ओस में भीगी रात पर हाथों के निशाँ!
चाँद रात में थिरकते कदम!
गुनगुनाती खामोशी!
कुछ शरारतें!
बदलते ख़याल!
वो शाम नियामत सी!!

अब तो यादें भी धुँधला गयी
कितनी परतें चढ़ी हैं धूल की
पीले पड़ गये हैं किनारे भी
कमजोर हो गयी है डोर
बस संभाला भर है किनारो से
छू दोगे तो टूट जाएगी डोर
बिखर जाएगा पुलिंदा
उडेगी धूल
घुट जाएँगी साँसें
रहने दो उसे वहीं
एक दिन दीमक का पेट भरेगा पुलिंदा!

Tuesday, June 24, 2008

आपकी याद आती रही..

निर्माता, निर्देशक मुज़फ़्फ़र अली की पहली फिल्म गमन, अपने खूबसूरत संगीत, गीतों और बेहतरीन अदाकारी का नमूना है! स्मिता पाटिल और फ़ारूख़ शेख की बेहतरीन अदाकारी से सजी ये फिल्म राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाज़ी गयी! और इसके दिल को छू लेने वाले संगीत निर्देशन के लिए सिल्वर लोटस अवॉर्ड से भी!
ये कहानी थी एक नौजवान की जो अपनी ज़िंदगी बेहतर बनाए के सपने ले कर लखनऊ से बंबई आता है, और ज़िंदगी की ज़ददो ज़हद में फँस कर वापस जाने के सपने ले कर रह जाता है!!

आपकी
याद आती रही रात भर
आपकी याद आती रही रात भर
चश्म--नम मुस्कुराती रही रात भर
आपकी याद आती रही..

रात भर दर्द की शमा जलती रही -
गम की लौ थरथराती रही रात भर -
आपकी याद आती रही...

बासुंरी की सुरीली सुहानी सदा -
याद बन बन के आती रही रात भर -
चश्म--नम मुस्कुराती रही...

याद के चाँद दिल में उतरती रही -
चाँदनी जगमगाती रही रात भर -
आपकी याद आती रही....

कोई दीवाना गलियों में फिरता रहा -
कोई आवाज़ आती रही रात भर -
चश्म--नम मुस्कुराती रही...
आपकी याद आती रही....



गायिका - छाया गांगुली
संगीत - जयदेव वर्मा
बोल - मख्दूम मोहिउद्दीन
फिल्म - गमन -१९७९

पल की तलाश..

हर पल तेरा साथ, तू नही तेरा ख़याल सही!!
सोचा एक पल तुम्हे भूल कर देखूं!
उस एक पल का अब भी इंतज़ार है!
सुबह उठी तो लगा , तुम देख रहे हो मुझे!
नज़रें अटकी हैं तुम्हारी मेरे चेहरे पर!!
उनींदी आखों ने देखा तुम्हे और मुस्कुराई,
और अलसाई सुबह में पीठ घुमा कर सो गयी मैं!
या कहूँ घुमा कर पीठ तुमसे, ढूढ़ती थी उस पल को!
जागी तो खिड़की से बाहर धूप की नर्माई देखी,
बाहर निकल कर मीठी धूप से घिरी मैं,
महसूस करती थी, गुनगुना नर्म आलिंगन तुम्हारा!
मगर मुझे तलाश थी अब भी उस पल की!
धूप से बच कर आँगन में आई तो,
छोटी टेबल पर अदरक तुलसी की चाय साथ रख,
मेरे इंतज़ार में तुम, आँगन महका रहे थे!
नज़र बचा कर तुमसे, साथ रखा अख़बार उठा कर,
चाय के साथ कमरे में आई!
तो तुम्हारा पीछे से हाथ पकड़ना,
खीच कर वापस बुलाना,
हाथ से अख़बार खीच कर पास बैठाना,
आखों में मेरी आखें डाल कर,
पूछना मुझसे....

" आज नाश्ते में क्या बनाओगी?"