Tuesday, July 29, 2008

सफ़र बनारस का - सांस्कृतिक विरासत का - part 2

सुबह कानो में जब आवाज़ आई " चाय, कॉफी, चाय..." नींद खुली तो बड़ा अच्छा
लग रहा था. टाइम देखा तो घड़ी 5:30 दिखा रही थी!सफ़र करते हुए सुबह जल्दी उठने
का अपना ही मज़ा है!चादर को ठीक से संभालते हुए, थोड़ा सा उपर उठ कर बैठे और
देख रहे थे, आस पास ज़्यादातर सभी सोए हुए थे! पीछे घूम कर देखा तो खिड़की से
बाहर नज़ारा जैसे अपनी तरफ ही खीच रहा था!बॅग से 'The zahir' निकाल कर
उल्टा लेट कर पढ़ने लगी! बीच बीच में बाहर देखना अच्छा लग रहा था!



जैसे ही एक ब्रिज शुरू हुआ
तो सोचा होगी कोई नदी,
नाला या नहर!पर सोच के
विपरीत जैसे ही उपर देखा
तो अनंत नदी थी! आसपास
किसी को कहते सुना,
ये इलाहाबाद संगम है! देख
कर दिल खुश हो गया!किताब
छोड़ कर, जल्दी से कॅमरा
निकाला और फोटो खीचने लगी!
बाहर देख कर जो महसूस हो
रहा था,उसे बस महसूस किया जा सकता है, उसका वर्णन करना .......शायद अहसास
के साथ बेईमानी हो जाए!ब्रिज पार करते ही ख़याल उड़ान भरने लगे, सवालों के साथ,
क्या वो लाइन जो मुझे दिख रही थी पानी पर ३ नदियों के बीच की लाइन थी?
क्या नज़ारा होता होगा यहाँ कुम्भ पर? कितने सवाल और कितने ख्याल!!


जैसे ही सीधे हो कर लेटी तो देखा सामने कोई ३५-४० साल की महिला मेरी तरफ देख
रही थी! मुझे लगा शायद बैठने के लिए पूछ रही थी तो पैर उपर खीच लिए!ना जाने
किस भाषा में उन्होने कुछ कहा हमसे, जिसे सुन कर शकल पर सवालिया निशान साफ
नज़र आने लगे थे! कुछ समझ पाते इसी पहले, साथ वाली बर्थ पर लेटी बेटे की मम्मी
ने पूछा " आप जानती हैं इन्हे?"
"नही, क्या ये मुझसे बात कर रही है?"
" जी, वो कह रही है, के आप कहाँ छोड़ कर चली जाती हैं बार बार? उनका मन नही लगता आपके बिना"
"हैं!!!!!!! पर मैं तो इन्हे जानती भी नही!! "
" क्या सच?"
" अब इसमें झूठ बोलने के लिए क्या है?"
" हां , ये भी है!"
इतना कह कर उन्होने महिला की तरफ देखा और ना जाने क्या कहा, वो मुस्कुराई और
आगे
बढ़ गयी, फिर पीछे मूड कर देखा, एक बार और मुस्कुराई और चली गयी!इतनी
देर में हमें नानी दादी सब याद आ गये थे! दिमाग़ में सारे जोड़ तोड़ होने शुरू हो गये
थे! अगर ऐसा हुआ तो क्या कर सकते हैं, और वैसा हुआ तो क्या?लाइफ में एक दो
बार दिमागी रूप से असंतुलित लोगों से ऐसे हालातों में सामना हो चुका है, कि ऐसा कुछ
भी होते ही लगने लगता है, आगे क्या होगा!!!
खैर, जाते ही उनके चैन कि साँस ली हमने, और रश्मि (बेटे कि मम्मी) से पूछा,
"ये क्या था?"
"वो कुछ नही, नींद में चलने कि आदत है उन्हे, तो ग़लती से आपके पास आ गयी थी!"
हमारी और हमारे दिल कि हालत उस वक़्त क्या थी, ये बस हम ही जानते थे!
इस सबके चलते पता लगा हम इलाहाबाद स्टेशन पहुँच चुके हैं! ४ महीने के नवाब साहब
जाग चुके थे, और बड़े खुश थे! बस हमारी तरफ़ देख कर मुस्कुराने भर की देर थी की
हमारी बातें शुरू हो गई।
" अरे ये इतना सुंदर कौन है ?"
" ....... :D"
"अच्छा यहाँ जो जो सुंदर बच्चे हैं अपने हाथ ऊपर उठाओ।"
" ....:D"
" ये कम्बल के साथ कुश्ती कौन कर रहा है?"
".... :D"
"
ये इतना अच्छा डांस किसको आता है ?"
" ..... :D"
..................
........................

तभी याद आया, अरे ये अंशुल और किन्शु तो रात मिलने आने वाले थे, मेरी सीट पर!!
फ़ोन उठा कर देखा तो बैटरी कम थी। सोचा एक बार स्टेशन पर पहुच कर ही फ़ोन किया जाए!
अंशुल से फ़ोन पर तो बात हुई थी, पर मिले नही थे। पहचानते भी नही थे। जब आप किसी
से बात करते हैं, तो उसकी एक छवि बना लेते हैं अपनी सोच में, मेरी सोच में अंशुल एक
बेहद कमज़ोर सा, सीधा सा, थोड़ा सांवला सा शर्मीला लड़का था।। किन्शु को हम कॉलेज के
दिनों से जानते थे।
तभी किसी ने कहा बनारस आने वाला है, तो हम भी सामान पैक करके दरवाजे के पास पहुँच
गए। बस उतरने ही वाले थे, कि संजय मिल गया। संजय - छोटे नवाब के पापा।
" आपने तो कहा था बनारस जा रही हैं!!"
"हांजी, बनारस आ गया न, तो बस चलते हैं। "
" कहाँ !!!!! ये स्टेशन? अरे नही नही, ये बनारस नही है। "
" सुनते ही माथा ठनका, बहार झाँका तो कहीं भी स्टेशन का नाम नज़र नही आया,सामने से
एक चाय का ठेला निकला तो स्टेशन का नाम पढ़ते ही समझ आ गया, तो बस सफर हो
ही जाता। संजय का शुक्रिया अदा करके वापस आए, तो छोटे नवाब साहब इतने खुश हो गए,
जैसे पता नही कब से बिछडे मिल गए।
" हेल्लो... अरे यार उठ गए क्या?"
" हांजी , कहाँ हो आप लोग? मुझे लगा आप मिलने वाले थे रात को!"
"अरे बातों में पता ही नही चला कब १ बज गया फिर देर इतनी हो गई थी कि, ठीक नही लगा।
कोई बात नही, अभी मिल लेंगे स्टेशन पर। "
" हाँ अब तो वहीँ मिलेंगे।"

आखिरकार, ट्रेन बनारस पहुँची, उतरते ही गर्मी भी इतनी भली लग रही थी, के क्या कहें।
" हाँ, स्टेशन आ गया। "
" जानती हूँ, उतर चुकी हूँ, थैंक्स। "
" आप कहाँ हो? एक कार करते हैं स्टेशन के बाहर मिलते हैं। थोडी भीड़ कम होगी तो पहचानना
आसान रहेगा। मैं प्लेटफोर्म के बाहर हूँ, पीसीओ के सामने। "
" ठीक है हम आते हैं।"
काफी देर बाद एक गोरा सा सेहतमंद लड़का हमारी तरफ़ आता दिखाई दिया तो लगा कोई किसी को
लेने आया होगा। हम तो ढूंढ रहे थे कोई पतला सा, सांवला, सीधा सा लड़का, जिसके बाल भी मांग
निकाल कर बनाये गए होंगे।
( अरे ये मेरी तरफ़ क्यों चला आ रहा है!!)
" हाय..... अंशुल... "
देखते ही अपनी सोच पर हँसी आ गई। धुप का चश्मा लगाये हुए,
लाल रंग कि टी शर्ट में भला सा लगने वाला लड़का अंशुल था।






Wednesday, July 16, 2008

सफ़र बनारस का - सांस्कृतिक विरासत का - पार्ट 1

बनारस... एक शहर ख़ुद में कितनी कहानियाँ, कितना इतिहास छुपाये हुए।
हिंदुत्व का इतिहास, दुनिया की सबसे पुराना शिक्षा केन्द्र आज भी शहर के बीचों बीच उसी शान से जिंदा है जिस शान से सदियों पहले इसकी स्थापना हुयी थी।
आज भी दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यता के निशान ख़ुद में संजोये हुए इस शहर की खूबसूरती, इसकी सादगी और इसके हर कोने में बिखरे रंग में बखूबी नज़र आती है।
जब सिद्धार्थ ने आने के लिए invite तो मना करने का मन भी नही किया। मौका था शादी का, सिद्धार्थ की शादी। शुची को जानती तो थी, पर कभी इतनी बात भी नही हुयी के कहीं यादों में कोई निशान छोड़ जाए । :)
अरे ये तो बताया ही नही, सिद्धार्थ हमारे कॉलेज फ्रेंड और शुची उनकी होने वाली अर्धांगिनी। :)

सफर की शुरुआत थी office से भागने की जल्दी। Sham की ट्रेन पकड़ने से पहले घर जाकर bag बदलना था। पहले से pack हुए bag की zip जो ख़राब हो गई थी।
तरो ताज़ा फील करने के लिए नहाना भी ज़रूरी था। किसी तरह ट्रैफिक से लड़ते झगड़ते घर पहुंचे तो पौने सात हो चुके थे।
ट्रेन नयी दिल्ली स्टेशन से साढ़े सात बजे निकलती थी! नहा कर जैसे ही टाइम देखा और बाथरूम से बाहर निकले इतनी ज़ोर से पैर फिसला के बस घर में जली सारी बत्तियाँ एक साथ जलने बुझने लगी आखों के आगे!
किसी तरह से दीवार का सहारा ले कर उठे तो नज़र आया कंधे के पास बाजू में नील पड़ चुका था! जल्दी से स्प्रे लगाया बाग उठाया और नीचे भागे, जहाँ टॅक्सी वेट कर रही थी!
" थोड़ा जल्दी चला लो प्लीज़, मुझे देर हो गयी है"
"टाइम से निकलना था अगर जल्दी थी तो"
(कैसे बताती टाइम तो बाथरूम के आगे फिसला पड़ा था)
खैर मनाते मनाते स्टेशन पहुँचे तो अंशुल का मेसेज गया था " ट्रेन प्लॅटफॉर्म नंबर 8 से निकलती है!" उसके बाद तो उठा कर बैग जो दो दो सीढ़ियाँ एक साथ फर्लाग कर भागे तो बस ट्रेन के साथ खड़े हो कर ही दम लिया!
"हेलो अरे यार ये 1 किस तरफ है?, मुझे तो समझ नही रहा है! ट्रेन तो दोनो तरफ इतनी लंबी नज़र रही है के जब तक डब्बा मिलेगा, छूट ही जाएगी!"
" ऐसा करो ट्रेन कि तरफ मुह करके खड़े हो जाओ, और अपने बाईं तरफ चलते जाओ, आगे जा कर मिल जाएगा"
"आप लोगों का कौन सा डब्बा है?"
" हम लोग सी 4 में हैं! तुम अपनी सीट पर सेट्ल हो जाओ तो मिलने आते हैं तुमसे!"
"ओके"
" टी.टी.साहब, अरे सर, ये 1 किस तरफ है? ट्रेन ख़तम होने को गयी है, कम्पार्टमेंट नही मिला!"
" बस अगले वाला आप ही का नंबर है!"
" ओह, थॅंक यू"
डब्बे में घुसते ही समझ गया , कि बेटा सफ़र यादगार रहेगा! फटाफट सामान अडजेस्ट करके लॅप टॉप खोला और ऑफीस का काम ख़तम करने में लग गयी, ताकि बाकी के सफ़र में कोई टेंशन ना रहे!
"मेडम वेज या नो वेज?"
अरे कब ४५ मिनिट निकल गये पता ही नही चला! लॅप टॉप कि बॅटरी भी ख़तम होने वाली थी! कोई सॉकेट भी नही था ट्रेन में! पर काम लगभग हो ही गया था!
"हांजी मैं वेज खाना लूँगी, आप यहाँ साइड में रख दीजिए, मैं काम ख़तम करके खा लूँगी! थॅंक यू!"
कह कर जैसे ही चारो तरफ देखा, तो आस पास सबकी नज़र टिकी थी मुझ पर और इस डब्बे पर जिस पर मैं टिक टिक करने में लग हुई थी! साथ बैठे भाईसाहब, मंद मंद मुस्कुराहट कि साथ डब्बे में ही झाँक रहे थे, जैसे कोई फिल्म चल रही हो! जैसे ही लॅप टॉप बंद करके बॅग में रखा, सामने बैठी आंटी थाली पकड़ कर बोली, खाना खा लो! एक बार के लिए लगा, वाह वाह क्या बात है, क्या उस तरफ जाने वाले लोग इतना ख़याल रखते हैं अपने आस पास!!
पर ग़लतफहमी जल्दी दूर हो गयी, ख़याल मेरा नही वो अपनी बेटी का रख रही थी! 13 साल कि बेटी खाने में ना नुकुर कर रही थी! पापा कि लाडली बेटी ने फरमाइश की के दही तो मीठी चाहिए, तो पापा फ़ौरन पॅंट्री कि तरफ भागे और जैसे भी करके चीनी एक टिश्यू में रख कर ले आए! बेटी ने खाना खाया, कोक कि फरमाइश कर डाली, अब रात को कोक कहाँ से आएगी? पर पापा हैं ना!!
"बेटा कोक तो नही है, मिरींडा से काम चला लो, सुबह कोक भी जाएगी!"
" पर पापु आपको मैने बोला था ना, मुझे ट्रेन में कोक चाहिए!"
"अच्छा ये लो दवाई खा लो"
उउउँ....
" खा लो बेटा "
"अच्छा, पर मुझे मिरींडा गिलास में चाहिए! मैं ऐसे नही पीऊँगी! "
पापा क्या ना करते, फिर भागे पॅंट्री कि तरफ और गिलास ले आए!"
इस पूरे सिलसिले को खाना खाते हुए देखा और सोच रही थी, क्या ऐश है इस उम्र में! इस सबके साथ, सामने बैठे थे फरीदाबाद से एक २३-२४ साल का लड़का अपनी पत्नी और 4 महीने के बेटे के साथ! पहला बेटा था और पापा ख़ुद पूरी ज़िम्मेदारी उठना चाहते थे तो लगे हुए थे उसे ट्रेन में घुमाने में, उससे बातें करने में और जैसे ही वो रोना शुरू करे उसे बहलाने में!
इतनी देर में बेटे साहब का मान उखड़ गया, और लगे ज़ोर ज़ोर से रोने! मोटी मोटी आखों में से उससे भी मोटे मोटे आँसू निकलने लगे! मान तो किया थोड़ा सा खेल कर थोड़ा सा बहला कर चुप करा दें, पर सोचा पता नही क्या सोचेंगे, तो बस देख रहे थे और सोच रहे थे, के बच्चे हमेशा सुंदर क्यों लगते हैं? रोते हुए, हंसते हुए, काले, गोरे, पीले, साँवले, सब के सब बराबर सुंदर होते हैं!
सुना है, जब बच्चे सोते हैं, तो पारियाँ सच मुच आती है सपनो में उनके, जिन्हे देख कर वो नींद में भी मुस्कुराते रहते हैं! और वो एक मुस्कुराहट कि झलक बाकी सब कुछ भुला देती है!
तो महाशय पापा कि गोद में रोए जा र्हे थे, और मम्मी लगी हुई थी चम्मच से दूध पिलाने में! भूख लगी थी उसे और नींद भी रही थी! समझ नही पा रहा था, पहले सो लूँ या पहले दूध पी लूँ!!
इतनी पूरी देर दूसरी फॅमिली कि बिटिया रानी अपनी फरमाइशे रखी जा रही थी! आख़िर परेशान हो कर बेटे के पापा ने भी बोल दिया, "आप लोग ज़रा जल्दी कर लेंगे? शायद इसको मम्मी के पास लेट कर नींद जाए, नही तो रो रो कर बुखार हो जाएगा!"
साइड बर्थ पर बैठे पति पत्नी अपना खाना खा कर ये सब देख रहे थे! थोड़ी देर बाद चादर ओढ़ कर पत्नी खर्राटे मारने में लगी थी, और पति देव को नींद नही रही थी!
कुछ ही मिनटों में जैसे सब चादर बिछाने और अपने अपने बॅग चैन से बाँधने में लगे थे! सब अपनी अपनी सीट पर कंबल ओढ़ कर सोने में लग गये! सबके लेटने के बाद पापा ने बड़े प्यार से अपने बेटे को निहारा मम्मी के पास लिटाया और बाहर जाने लगे! अचानक मेरी नज़र पड़ी तो देखा एक हाथ नही था उसका! कलाई से थोड़ा उपर से हाथ नही था! इतनी देर में वो बाहर जा चुका था! सीट कन्फर्म नही थी उसकी! रात भर बैठ कर सफ़र करना था उसे!
हैरान परेशान उसके बारे में सोचते हुए सोने कि कोशिश करने लगी! भगवान का शुक्रिया अदा किया कि मुझे अच्छी सेहत दी! हम सब किसी ना किसी चीज़ से परेशान हो कर बोलते रहते हैं, हमारी लाइफ में कितनी प्रॉब्लम्स हैं! पर शायद दुनिया में हमारी प्रॉब्लम्स से बड़ी बहुत प्रॉब्लम्स होती हैं, जिनको देखने के बाद अपनी ज़िंदगी को ले कर शिकायतें छोटी नज़र आने लगती हैं!
कानो में लगे MP3 प्लेयर में गाना चल रहा था " तू है आसमाँ में, तेरी ये ज़मीं है, तू जो है तो सब कुछ है, ना कोई कमी है!"
ना जाने कब पालने जैसी झूला झुलाती ट्रेन के हल्के हल्के झटकों में नींद गयी!