Friday, August 29, 2008

सफर बनारस का... सांस्कृतिक विरासत का... पार्ट 3

थोड़ा सा नज़र उठा कर देखा तो किन्शु भी नज़र आ गई।
" तुम कैसे जाने वाली हो?"
"पहले सोच रही थी, सिड को फ़ोन करके एड्रेस लेने का, पर अब सोचती हूँ हम लोग साथ चल सकते हैं। How are you going? do you know the address?
" क्यों टेंशन ले रही हो। सिड का cousin आया है लेने, तुम भी साथ चलो। "
" sounds perfect। चलो "
"हाय किन्शु, हाय ..."
"कैसे जा रहे हैं हम लोग?"
" ऑटो में। "
ऑटो में हम साढे तीन लोग एक साथ बैठे , अब पूछेंगे साढे तीन कैसे? एक हम, एक किन्शु और डेढ़ अंशुल.... ही ही .... सिड का cousin आगे ड्राईवर के साथ बैठा था। बिल्कुल चुप। मैं और किन्शु लगे ही थे कॉलेज की बातें करने में। कौन कहाँ हाय पूछने में।
" सौरभ नही आया?"
( सौरभ किन्शु के पतिदेव और हमारे पुराने मित्र हैं। )
" नही वो बंगलुरु में है। काफी दूर पड़ जाताऔर कुछ ऑफिस का भी काम था। "
" अरे अंशुल गिर तो नही रहे हो!! ठीक से बैठे हो न!! ही ही ही ..."

ऑटो में बैठे लंका बाज़ार से होते हुए, सिड के घर पहुँचे तो शादी के रीति रिवाज़, पूजा पाठ चल रहे थे! सिड का दूसरा कज़िन भाग कर उपर गया उसे बुलाने. सब छोटे बड़े कज़िन्स सिड के ऐसे लग रहे थे जैसे छोटा सिड स्कूल में, सिड कॉलेज में, सिड +२ में...!सिड जैसे ही दिखाई दिया तो लगा बहुत थक गया है! हाथ मिलाया तो देखा बुखार था ! कभी एक बात नही समझ आई, के शादी में अक्सर दूल्हा या दुल्हन बुखार में क्यों होते हैं? खैर!" अरे ये गगन और गीतांजलि भी अभी अभी आए हैं! चाय ही पी रहे थे! गगन को तो तुम जानती ही हो! आई आई टी के दिनो से , गीतांजलि गगन की वाइफ हैं!"" हाय गीतांजलि! नाइस मीटिंग यू! "गीतांजलि का चेहरा देखा तो लगा स्किन के नीचे बल्ब जलाया हुआ होगा! क्या चमक थी चेहरे पर!! " अरे तुम सब लोग पहले गेस्ट हाउस जा कर फ्रेश हो जाओ, थक गये होंगे! तब तक यहाँ से नाश्ता भी पहुँच जाएगा।

गेस्ट हाउस पहुंचे तो लगा ज़रा जल्दी से शाम को पहनने वाले कपड़े प्रेस कर लिए जायें। उसके बाद थोड़ा आराम करके खाना खाया जाए। बैग खोला तो सारे कपड़े मिल गए पर जो शादी में पहनना था वो गायब था। यानि के साड़ी गायब थी। !!!!!!!!!




Thursday, August 28, 2008

एक कतरन सूरज की
हम मुट्ठी में छुपाये हैं।
फिर जब भी चाँद रात में
बादल से छाये हैं।

मायूसी छूने से पहले
मुट्ठी आसमां में उठाये हैं।
गॅमी रात तन्हा में भी
सितारे जगमगाए हैं..

Tuesday, August 5, 2008

सूरज का हिस्सा...

बालकनी से देख कर आसमाँ
सोचती थी उस पल,
एक और दिन बीत गया
छोड़ गया एक शाम बोझिल

दिन ढला जा रहा था।
सूरज की पकड़ कर उंगली
खींच कर साथ अपने उसे भी
लिए जा रहा था!

फिर से एक अंधेरी रात का सोच
mudi अन्दर जाने को
नज़र पड़ी ढलते सूरज पर
और दिल जलाने को।

पर लगा बना कर छुरी बादल की
उसने सूरज पर रखा
मानो काट कर दे रहा हो मुझे
सूरज का एक हिस्सा।

"जा रोशन कर दे जहाँ
या जला दे उसे आग में
ये रोशनी से तर बतर
हिस्सा तेरा हुआ आज से"

संभाल कर दोनो हाथों में
टेढ़े मेढ़े कटे उस हिस्से को
अंदर ले आई कमरे में
समझ नही आया कहाँ रखूं !

जब ढूँढने पर और
सोच कर भी जगह ना मिली
तो सो गयी उसे
तकिये के नीचे रख कर

सोते हुए सोचती थी
कल किसको कितना दूँ इसमें से?
कितने जहाँ रोशनी को तरसते हैं
उनमें बाँट दूँगी इसके हिस्से

ले कर सपना एक रोशन सुबह का
सो गयी मैं इत्मिनान से!