Friday, February 20, 2009

धूल ...

तुमने कहा था, वक्त भर देता है हर जख्म

हर याद पर धूल चढ़ जाती है।

कितनी आँधियों से हो गुज़रे हम

तेरी यादें तो आज भी चमकती हैं!!!!

Thursday, February 19, 2009

कल रात..

कल चाँद गिर रहा था, भाग कर पकड़ा मैने!
डरा सहमा सा, शायद सितारों के साथ खेलते फिसला था!
शुक्रिया कह बातें छेड़ डी उसने!
कभी बताया नही तुमने, के तुम उसे जानते थे!

पूछ रहा था तुम्हारे बारे में!
कितना कुछ जानता था मेरे बारे में भी वो!!!
कभी बताया नही तुमने, तुम मेरी बातें करते थे!

सितारों की पुकार सुन कर वापस चला गया जब,
चाँदनी ठहरी थी कुछ देर मेरे पास!
बता रही थी, एक अंगूठी खरीदी थी तुमने मेरे लिए!
कैसे मन ललचाया था उसका भी, देख कर अंगूठी!
कभी बताया नही तुमने, तुम कितना प्यार करते थे!

नींद मेरी आखों से जाने लगी तो चाँदनी की आँखें मुन्दने लगी!
बैठ कर पलकों पर उसकी मुझसे बातें करने लगी!
शिकायत थी, कितनी रातें तुमने उसको आँखों में जगह नही दी!
खुली रख कर आखें ख्वाब बुनते थे तुम मेरे साथ !
कभी बताया नही तुमने, कितने सपने बुने थे तुमने!!

रात जाने लगी तो सब पूछते थे तुम्हारे बारे में,
कुछ बताया नही मैने, कैसे चले गये थे तुम!

Wednesday, February 18, 2009

सच..

जानता है तू भी तो , तेरी कहाँ है मुतवज्जो
फिर ये बेरुखी का भरम क्यों रखा है?
क्या कहेगा ज़माना?, ये सोच कर!!!
जी पे ये जुलम क्यों रखा है?

Tuesday, February 17, 2009

कभी कभी ...

शिरकत करते हैं जश्न में
गमी में नुमायाँ रहते हैं
हैरत की बात है
कुछ लोग ख़ुद को दोस्त कहते हैं!!!

Monday, February 16, 2009

दोस्ती...

चलन ज़माने का इसने अपनाया,
अपने से ऊपर वाले से हाथ मिलाया
पहले ठोकरे खाता था, करता था फरियाद,
अब सब देते हैं समझदारी की दाद।

....दिल ने आख़िर दिमाग से दोस्ती कर ली....!!!!

Friday, February 13, 2009

आफ्टर थोट्स

काश पहचान जाते वो नज़र
क्या करते मगर
इतना करीब था वो मेरे,
के धुंधला गई मेरी ही नज़र।

Thursday, February 12, 2009

बहाना बरसात का

जब सो कर उठे सुबह, तो बोले वो
रात शायद बरसात हुई है।
काश के उसने मेरी सूजी आखें देखी होती

जब ख्वाब भरे थे आखों में, तो शिकायत करती थी, मेरे लिए जगह नही,

आज जब बह गए कोरो से ख्वाब, तो मुई दरवाज़ा खटखटाने भी नही आती! !

कमबख्त नींद से बड़ी नाराज़गी है हमें।

Wednesday, February 11, 2009

खामोशी

खामोशी की इंतिहा देखी...
दिल टूटा, और आवाज़ न हुई।

Tuesday, February 10, 2009

मसरूफियत...

महानगर की मसरूफ़ियत क्या कहिए...
उठाला पढ़ कर पता चला, पड़ोसी की ख़ैरियत!!!

स्निप्पेट्स..

कभी पूछते थे लोग -" इतने गमजदा क्यों हैं"
आज पूछता था कोई "इतने खुशनुमा कैसे?"