Saturday, December 17, 2016

दिल्ली का बहिखाता (mydelhidiaries)

इस बहिखाते में हमारे दिल्ली में बीते सालों के छोटे मोटे क़िस्से जमा होते रहेंगे। घर से अलग १२ साल दिल्ली में रहकर जुलने बहुत कुछ देखा, महसूस किया और ऐसे हर कुछ संजीदा कुछ हल्के फुल्के अनुभवों को एक जगह रखने की कोशिश है इस बहिखाते में ।
शुरुआत करते हैं हल्के फुल्के मीठे क़िस्सों से ।
१. दिल्ली police -
बात तब की है जब हमने नयी नयी कार ली थी। CNG कार ली थी ये सोच कार के ये इन्वायरॉन्मेंट फ़्रेंड्ली रहेगी। अक्सर CNG सस्टेशन पर लम्बी क़तारें हुआ करती थी। जिससे बचने के लिए हमने सोचा घर के पास वाले २४ घंटे खुले रहने वाले स्टेशन से हम सुबह सुबह ६ बजे गैस डलवा लिया करेंगे । कोई झंझट नहीं लाइन में लगने का। तो हफ़्ते में २-४ बार हम जाके गैस डलवाया करते थे। सुबह सुबह कौन देखेगा सोच कर अक्सर रात के पजामा टी शर्ट में हर चले जाते थे।
एकऐसे ही एक दिन हम गैस डलवा कर आ रहे थे तो एक ४५-५० साल के police वाले ने रोक लिया।
"कहाँ जा रहे हो सुबह सुबह ? "
थोड़ा हिचकिचाते हुए हमने कहा ," बस यही पीछे स्टेशन से गैस डलवाने आए थे सर। क्या हुआ?"
"तुम्हारी नम्बर प्लेट से नम्बर ग़ायब हैं!!"
"अच्छा!! मैंने देखा नहीं, १-२ दिन में ठीक कर लूँगी।"
"दिल्ली के तो नहीं लगते!! कहाँ से हो?"
थोड़ा हिचकिचाते हुए मैंने कहा," आपको क्यों और कैसे लगा दिल्ली की नहीं हूँ मैं? वैसे सही कहा आपने, मैं उत्तराखंड से हूँ । यहाँ जॉब करती हूँ।"
" वही तो, हमें लगा था हमारे गाँव कि तरफ़ से हो । शहर के नहीं लगते !"
 हँसते हुए बोले वो । "दिल्ली वाले कहाँ हमसे इतनी तमीज़ से बात करते हैं!!"
एक बार अपने कपड़ों पर नज़र डालते हुए मैंने मन में सोचा, हमेशा अच्छे से तय्यार होने वाली मैं, १० साल साउथ दिल्ली में रहकर भी एक police वाले को गाँव वाली लगती हूँ। अपने ऊपर शक ही हो गया। पर चलो, अगर ऐसा लगकर भी फ़ाइन से बचती हूँ तो क्या बुरा है !!
जब अंदर ये सब घुमड़ रहा था तब बाहर से बस smile करके देखा मैंने police वाले को।
वो अभी भी मुस्कुरा रहे थे , "बड़ी ख़ुशी होती है देखकर जब लड़कियाँ घर से बाहर निकल कर सफल होती है। मेरी बेटी भी २ साल में डॉक्टर बन जाएगी । अभी पढ़ रही है मेडिकल कॉलेज में । ख़ुश रहो, ख़ूब तरक़्क़ी करो। और हाँ नम्बर ठीक करा लेना याद से ।"
police वाले का ये साइड देख कर ख़ुशी भी हुयी और सांत्वना भी । हामी भरके मैं चुपचाप वापस घर आयी और ऑफ़िस के लिए तय्यार होने लगी। अपनी दोस्त और flatmate को ये क़िस्सा बताया तो वो हँसते हँसते दोहरी हो गयी। "बेबी तुम कुछ भी कर लो गाँव वाली ही लगती हो policeवाले को!!"
और मैं सोच रही थी , सबका एक साइड ऐसा ही होता है, पर दिल्ली की भाग दौड़ में शायद व्यक्तित्व का ये हिस्सा बाहर आ ही नहीं पाता। 

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