Tuesday, October 7, 2008

सफर बनारस का... सांस्कृतिक विरासत का part 4

इतनी देर में कुछ समझ पाते, ये तो समझ में आ गया था के शाम के लिए मुसीबत का इतंजाम हो चुका था।
शादी में तो कार्गो और टी शर्ट नही पहनी जा सकती। कमरे में साथ में किन्शु थी। कुछ बात बता रही थी वो, के लगा जैसे उसकी आवाज़ बड़ी दूर से आ रही है। दिमाग का चलना बंद हो गया था। समझ नही आ रहा था के शाम को क्या किया जाए!!!
"अरे गीतांजलि, चलो यार थोड़ा मार्केट घूम आते हैं। " kinshu
"मार्केट जा रहे हैं तो अरे हम लोग सभी चलते हैं, कुछ खा लेंगे।भूख भी लगी है। नाश्ते में भी पकोडे थे, पेट नही भरा , मन भर गया। " gagan
"हाँ हाँ चलो, चलते हैं। "
सबका घूमने का प्लान बन रहा था, किसको क्या काम है मार्केट में। कुछ खास देखना हो तो।
और मेरा दिमाग चल रहा था, ' एक साड़ी खरीद ली जाए, पर याद आया एक ही हफ्ता पहले जेब ढीली हुई थी, अच्छी खासी महंगी साड़ी ले कर। दूसरी खरीदने की सोचने की bhi हिम्मत नही हुई। दिमाग में नई साड़ी की रंग खिलने लगेऔर चहरे से रंग उड़ने लगे।'
गेस्ट हाउस से बाहर निकले तो, कोई रिक्शा, कोई auto नही। थोड़ा आगे तक पैदल निकले तो एक auto dikhayi दिया। इस बार aage वाली सीट पर SADHE तीन लोग बैठे थे। अंशुल आगे ऑटो ड्राईवर के साथ गले में हाथ Daal कर बैठा था। जैसे कोई पुराने बिछडे दोस्त मिले हों।


जैसे तैसे लंका बाज़ार पहुंचे, भूख लग रही थी तो बस खाने का ठिकाना ढूँढना शुरू किया।


गगन पान वाले से, " भइया यहाँ पिज्जा हट होगा ?"


पान वाला, ".........................." मुह खोले देख रहा था, के पता नही क्या पूछा इन्होने।


"अच्छा भइया कैफे काफ़ी डे , म्क्दोनाल्ड्स, बरिस्ता होगा?"





इतनी देर में तो हमारा भी मुह खुल गया था।








"ओये अमेरिकन टूरिस्ट मत बन, बोल तो ऐसे रहा है, जैसे पैदा होते ही पिज्जा हट jaana शुरू कर दिया था। "








इतनी देर में पैदल चलते चलते इन सबका छोटा सौतेला भाई मिला। ' वारिसता काफ़ी डे। '








अन्दर जाते ही चाइनीज आर्डर कर दिया गया। और सबसे अलग हमने आर्डर किया सत्तू का पराठा आलू भरते के साथ।














पराठा सबसे बाद में आया, पर जब आया तो सबने चाइनीज छोड़ दिया, उसके बाद ४ और पराठे आर्डर किए गए।








स्वाद मुह में जैसे बस गया था। पेट भरा, पर दिल नही।



और दिमाग, वो तो पहले से ही भरा हुआ था। लड़को ने सोचा शाम से पहले बाल कटा लिए जाए, और लड़कियों ने सोचा कुछ मार्केट देखा जाए



" किशु, यार एक छोटी सी गड़बड़ हो गई है। साड़ी लगता है घर छूट गई है। समझ नही आ रहा है, क्या किया जाए। "
" क्या!!!!...... कैसे छूट गई? "
" पता नही, शायद लास्ट मिनट बैग बदला था उसी चक्कर में रह गई। अब क्या करूँ "
"मेरे पास एक सूट है, try करना हो तो देख लो। "
मरती क्या न करती, न चाहते हुए भी हामी भरनी पड़ी। कोई चारा भी तो नही था। तभी जसलीन का फ़ोन आया , अरे कहाँ हो तुम लोग? मेहँदी वाला गेस्ट हाउस में वेट कर रहा है। सुनते ही वापस भागे गेस्ट हाउस के तरफ़। साथ में दो सत्तू के पराठे पैक कराये।



वापस आ कर सूट देखा तो पीला गुलाबी, पहनी हमें लग रहा था ज़मीन ख़ुद बा अगले

के कपड़े तो पता ही थे। पीली टी शर्ट। खैर।



जब तक मेहंदी की भीनी भीनी खुशबु में नींद आई, जाने का टाइम हो गया था।
जैसे ही सूट पहना, शीशे में देखा, तो लगा काश के थोड़े मोटे होते, तो सूट माँगा हुआ न लगता। जैसे ही बाहर निकले बत्ती गुल। यानि के पसीने से नहाने का इंतजाम। जनरेटर कमबख्त को भी तभी ख़राब होना था।
देखा तो सभी लोग बाहर निकल आए थे। पंकज, सोनी, अंशुल, गगन, गीतांजलि।
मेरे पीछे पीछे कमरे से बाहर निकलते हुए किन्शु ने जैसे घोषणा कर दी। अरे भाई लोग, मैडम साड़ी भूल आई हैं। बस, जैसे सबने सुझाव देने शुरू किए।



" अरे तुम ऐसा करो रोजा बन कर चलो। "


(इसका मतलब नही समझा पाएंगे। )

इसी बीच में जैसे लाइट आई सबने भाग भाग कर कमरों में वापस जाना शुरू किया, ताकि तयार हो कर शादी में टाइम से पहुँचा जा सके!


तभी सिड का फोन आया" अरे कहाँ पहुँचे तुम लोग?"


"बस निकल रहे हैं यहाँ से!"


"अरे यार तुम टूरिस्ट बन कर आए हो या दोस्त?"


" ओहो, बस निकल रहे हैं!"किंशू ने अपनी शादी के टाइम की सुंदर सी साड़ी निकालीउ जसलीन ने भी अपनी शादी की शॉपिंग में से बेहद खूबसूरत साड़ी निकाली! हमें बस लगने लगा था, की जिस से सब तयार हो रहे थे, हम मेमसाब के साथ वाली मेड लगने वाले थे!हमारी साड़ी छूटने का किस्सा अब तक सबको पता चल चुका था! सोनी ने बड़े प्यार से आकर पूछा, "अरे आपकी साड़ी कैसे छूट गयी?""मत पूछो यार! बस अब तो छूट गयी!"अछा आप मेरी साड़ी पहन सकते हैं! मैं फालतू ले कर आई थी! हाँ, आपको पसंद आनी चाहिए! "मुझे लगा भगवान कहीं तो है ! नही तो उसके दूत कहाँ से आते!"थॅंक योउ सो मच! ज़रूर मैं देखना चाहूँगी!"सोनी और हम लगभग साइज़ में एक जैसे थे! "मेरी साड़ी थोड़ी सिंपल है! शादी के ही की नही है!""अरे साड़ी है ना! बहुत है! इस सूट से तो अच्छी होगी! "किस्मत हमारी जैसे पीलिया की मरीज़ थी! साड़ी देखी तो वो भी पीली! बड़े बड़े फूलों वाली! सलमे सितारे जड़े थे उस पर! सोच में पद गये, के ये सिंपल कहाँ से है!!! जैसे सोच ज़ाहिर किया, तो बा गे, शादी की बाकी साडियो से सिंपल है!खैर जैसे तैसे साड़ी पहनी, तो देखा कुछ हालात बेहतर लग रहे थे!