Saturday, June 10, 2017

Train diaries (mydelhidiaries)

Delhi to home, numerous journeys were made memorable by the ppl I met, while traveling. On one of such journeys , I was traveling back home for Diwali. 
I had a friend with me, who was from a nearby city. We both couldn't get confirmed tickets on shatabdi, therefore we travelled by some other train which was neither shatabdi nor Jan shatabdi. It was an experience of traveling in general class, where ppl will keep requesting to adjust for the seat. These 'requests' will make 8-9 ppl adjust in a seat of 4-5 ppl. 
In our section we had 3 ladies (including me) and a few men. After crossing Meerut, these men got down and a big group got in in the compartment. One after another all these men started their requests to adjust. We 2 girls were sitting near the windows across each other and the 3rd lady was sitting next to her. Every time a man from the group requested the lady to adjust, he will say," मैडम दिल में जगह होनी चाहिए, सीट पे तो बन जाती है।" ( madam u should have space in your heart, seat can be adjusted."
After adjusting 5 of those guys another guy repeated the dialog, now this woman lost her cool and said," भाई दिल की जगह तो भर गयी, अब तो फेफड़ों पे बैठ जा।" (Brother my heart is full now, but u can sit on my lungs"
Everyone laughed on her frustration but the mood in the compartment was light. After listening to their conversation we got to know they were policemen, who were transferred to different cities. One of them had a creative side, to keep life easy and entertained amidst of everything. When he started sharing details, whole compartment was bursting of laughter. 
"अरे मैडम हमें तो मायावती जी ने ये कह के ट्रान्स्फ़र कर दिया की तुम यहाँ काम नहीं कर रहे इसीलिए तुम्हारा ट्रान्स्फ़र हो रहा है! अरे कोई हमें यूँ बताए हम कहीं और जा के काम कर लेंगे क्या?"

"भाई हमारी लाइफ़ की तो यही ट्रैजडी है। हमारे तो तीन rules चलते हैं। 
1. इज़्ज़त है नहीं पर बेज्जती कोई कर नहीं सकता
2. पैसा है नहीं, पर ख़र्च चाहे कितना भी करा लो
3. काम है कोई ना पर महारे जैसा बिज़ी कोई नहीं
#traindiaries

Thursday, June 8, 2017

एक चम्मच चयवानप्रश (My delhi diaries )


(One spoon chyawanprash) 
Living alone in an apartment meant that there will be no one to look after me, if I fell sick. 
On one of such incidences, a friend offered his pup (pug), who was just week-10days old. I agreed and he came to drop his puppy to my place. 
I took the little fellow home and thought of keeping him in bed with me, cuddle and pamper him. In all these happy and relaxing thoughts, I forgot the amount of energy puppies carry.
What followed was nowhere close to my thoughts. Little fellow peed in each room (and not balcony), tore the newspaper into pcs and after all the mess, he charmed me, with his little paws. 
In the evening, my friend came to pick him up and I told him how it kept me on toes through out the day. 
He told me, it was his job, "to give you energy" He is just being true to his name ,"ek chamach chyawanprash". 
P.S : He was named after his looks, which actually resembled with a spoonful of chyawanprash.


#Mydelhidiaries 

Saturday, December 17, 2016

दिल्ली का बहिखाता (mydelhidiaries)

इस बहिखाते में हमारे दिल्ली में बीते सालों के छोटे मोटे क़िस्से जमा होते रहेंगे। घर से अलग १२ साल दिल्ली में रहकर जुलने बहुत कुछ देखा, महसूस किया और ऐसे हर कुछ संजीदा कुछ हल्के फुल्के अनुभवों को एक जगह रखने की कोशिश है इस बहिखाते में ।
शुरुआत करते हैं हल्के फुल्के मीठे क़िस्सों से ।
१. दिल्ली police -
बात तब की है जब हमने नयी नयी कार ली थी। CNG कार ली थी ये सोच कार के ये इन्वायरॉन्मेंट फ़्रेंड्ली रहेगी। अक्सर CNG सस्टेशन पर लम्बी क़तारें हुआ करती थी। जिससे बचने के लिए हमने सोचा घर के पास वाले २४ घंटे खुले रहने वाले स्टेशन से हम सुबह सुबह ६ बजे गैस डलवा लिया करेंगे । कोई झंझट नहीं लाइन में लगने का। तो हफ़्ते में २-४ बार हम जाके गैस डलवाया करते थे। सुबह सुबह कौन देखेगा सोच कर अक्सर रात के पजामा टी शर्ट में हर चले जाते थे।
एकऐसे ही एक दिन हम गैस डलवा कर आ रहे थे तो एक ४५-५० साल के police वाले ने रोक लिया।
"कहाँ जा रहे हो सुबह सुबह ? "
थोड़ा हिचकिचाते हुए हमने कहा ," बस यही पीछे स्टेशन से गैस डलवाने आए थे सर। क्या हुआ?"
"तुम्हारी नम्बर प्लेट से नम्बर ग़ायब हैं!!"
"अच्छा!! मैंने देखा नहीं, १-२ दिन में ठीक कर लूँगी।"
"दिल्ली के तो नहीं लगते!! कहाँ से हो?"
थोड़ा हिचकिचाते हुए मैंने कहा," आपको क्यों और कैसे लगा दिल्ली की नहीं हूँ मैं? वैसे सही कहा आपने, मैं उत्तराखंड से हूँ । यहाँ जॉब करती हूँ।"
" वही तो, हमें लगा था हमारे गाँव कि तरफ़ से हो । शहर के नहीं लगते !"
 हँसते हुए बोले वो । "दिल्ली वाले कहाँ हमसे इतनी तमीज़ से बात करते हैं!!"
एक बार अपने कपड़ों पर नज़र डालते हुए मैंने मन में सोचा, हमेशा अच्छे से तय्यार होने वाली मैं, १० साल साउथ दिल्ली में रहकर भी एक police वाले को गाँव वाली लगती हूँ। अपने ऊपर शक ही हो गया। पर चलो, अगर ऐसा लगकर भी फ़ाइन से बचती हूँ तो क्या बुरा है !!
जब अंदर ये सब घुमड़ रहा था तब बाहर से बस smile करके देखा मैंने police वाले को।
वो अभी भी मुस्कुरा रहे थे , "बड़ी ख़ुशी होती है देखकर जब लड़कियाँ घर से बाहर निकल कर सफल होती है। मेरी बेटी भी २ साल में डॉक्टर बन जाएगी । अभी पढ़ रही है मेडिकल कॉलेज में । ख़ुश रहो, ख़ूब तरक़्क़ी करो। और हाँ नम्बर ठीक करा लेना याद से ।"
police वाले का ये साइड देख कर ख़ुशी भी हुयी और सांत्वना भी । हामी भरके मैं चुपचाप वापस घर आयी और ऑफ़िस के लिए तय्यार होने लगी। अपनी दोस्त और flatmate को ये क़िस्सा बताया तो वो हँसते हँसते दोहरी हो गयी। "बेबी तुम कुछ भी कर लो गाँव वाली ही लगती हो policeवाले को!!"
और मैं सोच रही थी , सबका एक साइड ऐसा ही होता है, पर दिल्ली की भाग दौड़ में शायद व्यक्तित्व का ये हिस्सा बाहर आ ही नहीं पाता। 

Friday, October 26, 2012

Snippets

शाम गुज़र गयी तेरे इंतजार में,
शब् भी कहीं यूँ ही ना गुज़र जाए !
रुखसत किया उन्होंने कुछ इस तरह हमें,
फिर मिलने की उम्मीद में कहीं ज़िन्दगी न गुज़र जाए!!

Wednesday, January 4, 2012

गीली मिटटी

दफ़नाए जाते रहे सालो, जो सीनो में सितारो के,
मिट्टी उनकी क़ब्रों की गीली है आज तक!
कौन कहता है मौसम का मिज़ाज़ बदला है!!

सालों बीत गये,
बीत गयी रातें,
सर्द कोहरे में दफ़न रातें!
सितारे अब भी उनका पता ढूँढते हैं,
जिनको दफ़न किए, सीनो में जागते हैं रात भर!
कोई होश में लाए सितारों को,
और दे दे खबर!
ना आए यकीं तो, क़ब्रें दिखा देना!
मिट्टी उनकी क़ब्रों की गीली है आज तक!
कौन कहता है बदला है मौसम का मिज़ाज़!!

Tuesday, September 6, 2011

Khamoshi

कभी लफ्ज़ ज़रूरी नहीं थे !
कभी लफ्ज़ बाकी नहीं थे !

ख़ामोशी भी मूडी हो चली है !

Friday, September 2, 2011

उलझन....

उँगलियाँ उलझती है उसकी उँगलियों में जब,
ये ज़िन्दगी सुलझी सी लगती है!