Tuesday, February 27, 2007

02/22/07




Parzania vs Black friday

Parzania VS Black friday.
Saw both the movies within 2 days. 1st day parzania and 2nd day black friday.
2 different movies.
One common msg - An eye for an eye will make the whole world blind.
One common subject - Communal dissonance.
Parzania looks our for the common people's dream of a peaceful land where despite of all the differences (what they have among themselves), they know how to live happily in a society.
Black friday reveals the planning and execution of the Bombay blasts, one of the most traumatized day in Recent Indian history.
'Parzania' is the name of the dream land of a small 10yr old parsi boy Parzan. His dream land has hills of icecream, trees of chocolates and candies. Where cricket is the biggest religion and it takes over everything... Everything like Mum's made pudding, homework etc.
Black friday is (as i mentioned above) is the revelation of the bomb blast planning. How and why it was planned? How did they 'succeed' in the execution of the plan, what all they missed in the plan and how a small mistake helped police to track all the culprits.
Parzania - Communal disorder in Gujrat was the result of Godhra. Where Muslims had burnt a bus carrying hindus. There were hindu women and kids who were burnt alive in the bus.
Result was Gujrat riots, when Hindu started planning against muslims to take the 'revenge' of Godhra. All hindu houses were marked with saffron flag. Details of the families were taken in the name of municipal/voting system.
Black friday was the result of demolition of Babri masjid in Ayodhya. In the aftereffects of the destruction of masjid, muslims as well as hindus lost their families and properties. One of the main culprit of the bomb blasts 'Tiger memon' had big loss in his silver smuggling business and property.
That was the beginning of the plan.
Parzania - A story of the parsi boy and his family, who did not belong to either hindu or muslim community. But till date they are carrying the pain of loosing a loved member and a loving family.
How the politicians turns and twists the system as per their convenience and also to fulfill their political interests. Till date the family is living in hope that their son will return one day. Unfortunately,this movie never got released in Gujrat, where it could have helped in finding the boy. In the end of the movie a picture with mobile number is shown, so that the boy could be found.
Black friday - Story moves backward, from the day police got the first hint about the blasts, towards the day, when planning for the same started. How the police found one link and started getting links one after another with the help of one of the members of Tiger memon's group.
His realisation of the facts and truth and helping police in finding out the same lead to the final judgement. Verdict took 13years for the final judgement.
RECOMMENDATION - BOTH MOVIES ARE MUST WATCH! ! ! !

Wednesday, February 21, 2007

MYSTICAL CREATURE - WHICH ONE ARE YOU?




You're a MERMAID! A slave to the sea!Your mood changes like the tides of the sea. Some people might call you bipolar, but you're just emotional. That's a good thing! It's not healthy to hold in all of your emotions! Along with moodiness you are a dreamer. You space out constantly dreaming about something that can never happen or you prince charming. What can you say, you're a hopeless romantic. (me:probably watches chick flicks non stop) But every time you meet someone you like they get swept away. And you are doomed to feel bad and sorry about them. You are probably great at writing and poetry, because you day dream so much. When you're with friends you feel truly accepted. That is where you feel the most at home. As long as you keep that moodiness in check, everyone will love you!

Friday, February 16, 2007

Snippets

ख़ुद की चीज़ तोड़ दी उन्होने
सोच कर हमारा दिल..
*********
हर पल की मौत प्यारी लगी
उम्मीद तेरी पाकर
********
क़त्ल
हुआ भी मैं
गवाह भी मैं
********
जिस दिल को मरहम दिया
चाक जिगर उसी ने किया
********

Kal aur aaj..

हम यूँ भी थे..
हर बात में आँसू आते थे
गिरते खेल में, या दोस्त से लड़ते
रो रो कर घर में बताते थे
अगले दिन सब भूल भाल कर
दोस्त और खेल में रम जाते थे

हम यूँ भी हैं
दुखती हर बात , छिपाते हैं
आँसू अंदर पी जाते हैं
रूठे जाते हैं सब क्यों कर
ना कोई पूछे, ना बताते हैं
याद यूँ सब कुछ रहता है
चाहे भी तो भुला ना पाते हैं

Thursday, February 15, 2007

Writer unknown

क्यूं कहते हो मेरे साथ कुछ भी बेहतर नही होता
सच ये है के जैसा चाहो वैसा नही होता
कोई सह लेता है कोई कह लेता है
क्यूँकी ग़म कभी ज़िंदगी से बढ़ कर नही होता
आज अपनो ने ही सीखा दिया हमे
यहाँ ठोकर देने वाला हैर पत्थर नही होता
क्यूं ज़िंदगी की मुश्क़िलो से हारे बैठे हो
इसके बिना कोई मंज़िल, कोई सफ़र नही होता
कोई तेरे साथ नही है तो भी ग़म ना कर
ख़ुद से बढ़ कर कोई दुनिया में हमसफ़र नही होता

Bandhe hue toofaan

This one is dedicated to all the courageous people who accept challenges in life despite all odds. They have heart and soul and a never give up attitude even in the worst of the situations.

तूफ़ानो की बस्ती है ये,
थामें ये तूफ़ान कहाँ!!

अंदर जो ये आग छुपी है,
उसको भी आराम कहाँ!!

ज़िंदादिल जीते बस्ती मे,
मौत का फिर क्या काम यहाँ!!

चुनौती से डर जायें क्यों कर,
उनसे हम परेशान कहाँ!!

जोश-ए-जान अपने अंदर जो,
ख़र्च करें वो तमाम कहाँ!!

जान तो हम एक पल में दे दें,
पर ऐसा पैमान कहाँ!!

जीते हैं यूँ सर उठा कर,
मौत रहे हैरान यहाँ.

तूफ़ानो की बस्ती है ये,
थामें ये तूफ़ान कहाँ!!

Wednesday, February 14, 2007

Koi gaata main so jaata.. Dr Harivansh Rai Bachchan

कोई गाता मैं सो जाता..

संस्कृति के विस्तृत सागर मे
सपनो की नौका के अंदर
दुख सुख की लहरों मे उठ गिर
बहता जाता, मैं सो जाता ...

आँखो मे लेकर प्यार अमर
आशीष हथेली मे भर कर
कोई मेरा सर godi मे रख
सहलाता, मैं सो जाता ...

मेरे जीवन का कारजल
मेरे जीवन का हलाहल
कोई अपने स्वर मे मधुमय कर
दोहराता मैं सो जाता..

कोई गाता मैं सो जाता ...

Khuda ka khat

कुछ कहना चाहता था तुमसे,
वक़्त तुझे कभी ना मिल पाया.

ख़त लिख कर आज मैं भेज रहा,
फिर कहना मत, ना समझा पाया.

जब भेजा तुझे ज़मीन पर था,
एक सपना हक़ीक़त बन आया.

कुछ रंग दिए थे दुनिया में,
अब देखा तो धुंधला पाया.

कुछ हवायें दी थी महकती सी,
आज रुका था पल भर, ना साँस आया.

एक जहाँ दिया था आदम को,
गुज़रा वहाँ से तो पहचान ना पाया.

नही जानता क्या लिखू आगे,
खुदा भी मैने बदला पाया.

कुछ लोग कभी बुलाते थे,
क्या भुला खुदा वो याद आया!!!!!!!!

Monday, February 12, 2007

Madhushala..Dr Harivansh rai bachchan

Heres the link for madhushala..

http://manaskriti.com/kaavyaalaya/mdhshla.stm

In conversation with God.. Aarambh se ant tak.

आरंभ .. एक अंश का..
मैं अंश .. हूँ तेरा
तू ना माने .. मैं मानती हूँ
तू ना जाने .. मैं जानती हूँ
एक दिन मिला था तू मुझे!!!
कुछ मिला .. तेरा साथ
कुछ बना .. एक सपना
कुछ टूटा .. एक ख़याल
कुछ छूटा .. एक हिस्सा
कुछ साथ ..बस यादें
कुछ यादें .. एक हँसी
कुछ यादें ..एक दर्द
कुछ पल .. एक जीवन
एक जीवन मैं .. तेरा ही
तू ना माने .. मैं मानती हूँ
तू ना जाने .. मैं जानती हूँ
मैं भी मिलूंगी एक दिन तुझ में

अंत ...
या कहें अनंत
एक अंश तेरा

Sunday, February 11, 2007

Jeevan ki aapa dhapi - Dr Harivansh rai bachchan

जीवन की आपा धापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पैर बैठ कभी ये सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना, उसमें क्या बुरा भला

जिस दिन मेरी चेतना जागी मैने देखा
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,
हर एक यहाँ पैर एक भुलावे में भूला,
हर एक लगा है अपनी अपनी दें लें में,

कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भॉँच्चका सा --
गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊं किस जगह?
फिर एक तरफ़ से आया ही तो धक्का सा,
मैने भी बहना शुरू किया इस रेले में;

क्या बाहर की तेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का उहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा वही मन के अंदर से उबल चला

जीवन की आपा धापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी ये सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना, उसमें क्या बुरा भला

मेला जितना भड़कीला रंग रंगीला था
मानस के अंदर उतनी ही कमज़ोरी थी
जितना ज़्यादा संचित करने की ख़्वाहिश थी
उतनी ही छोटी अपने कर की झोली थी

जितना ही बिर्मे रहने की थी अभिलाषा
उतना ही रेले तेज़ धकेले जाते थे
क्रय-वि क्रय तो ठंडे दिल से हो सकता है
ये तो भागा भागी की छीना जोरी थी

अब मुझ से पूछा जाता है क्या बतलाऊं
क्या मैं akinchan बिखराता पाठ पर आया
वह कौन रतन अनमोल ऐसा मिला मुझको
जिस पर अपना मान प्राण nichaavar कर आया

ये थी तक़दीरी बात, मुझे गुण-दोष ना दो
जिसको समझा था सोना वो मिट्टी निकली
जिसको समझा था आँसू वो मोती निकला

जीवन की आपा धापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी ये सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना, उसमें क्या बुरा भला

मैं जितना ही भूलुँ bhtkoon या भरमाऊं
है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है
कितने ही मेरे पाँव पड़ें उँचे नीचे
प्रति पल वो मेरे पास चली ही आती है

मुझ पर विधि का अहसान बहुत सी बातों का
पर मैं kritgy उसका इस पर सब से ज़्यादा --
नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,
अनवरत समय की चक्की चलती जाती

Agnipath - Dr Harivansh rai bachchan

अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ
वृक्ष भले हों खड़े
हो घने हो बड़े
एक पत्र छह भी
माँग मत, माँग मत, माँग मत
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ

तू ना थक़ेगा कभी
तू ना थमेगा कभी
तू ना mudega कभी
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ

ये महान दृश्य है
चल रहा मनुष्य है
अशरु स्वेद रक्त से
लथपथ, लथपथ, लथपथ
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ