For those who don't know about the background of the following lines.
This was the sound track of Doordarshan serial " Bharat ek khoj" based on Pdt. Nehru's book " Discovery of India".
Some parts of the below lines are from Rigveda..
सृष्टि से पहले सत् नहीं था, असत भी नहीं
अंतरिक्ष भी नहीं, आकाश भीं नहीं था
छिपा था क्या कहाँ, किसने ढका था
उस पल तो आगम, अटल जल भी कहाँ था
सृष्टि का कौन है करता
करता है वा अकर्ता
ऊँचे आकाश में रहता
सदा अध्यक्ष बना रहता
वहीं सचमुच में जानता..या नहीं भी जानता
है किसी को नहीं पता, नहीं पता,
नहीं है पता, नहीं है पता
वह था हीरणयगर्भ सृष्टि से पहले विद्यामान
वही तो सारे भूत जात का स्वामी महान
जो है अस्तित्वामान धरती आसमान धारण कर
ऐसे किस देवता की उपासना करें हम अवी देकर
जिस के बल पर तेज़ोमय है अंबर
पृथ्वी हरी भारी स्थापित स्थिर
स्वर्ग और सूरज भी स्थिर
ऐसे किस देवता की उपासना करें हम अवी देकर
गर्भ में अपने अग्नि धारण कर पैदा कर
व्यापा था जल इधर उधर नीचे उपर
जगा चुके वो का एकमेव प्राण बनकर
ऐसे किस देवता की उपासना करें हम अवी देकर
ओम ! सृष्टि निर्माता स्वर्ग रचीयता पूर्वज रक्षा कर
सत्य धर्म पालक अतुल जल नियामक रक्षा कर
फैली हैं दिशाएं बहू जैसी उसकी सब में सब पर
ऐसे ही देवता की उपासना करे हम अवी देकर
ऐसे ही देवता की उपासना करे हम अवी देकर
शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2007
बुधवार, 31 जनवरी 2007
याद एक छुट्टी की -
चॉख़ट पकड़े खिड़की की ,
धूप बाहर को लटकी सी ,
पास की भट्टी, ताज़ी आग से भरी
मूंगफली की महक बहाती थी.
आँगन में दादी, माँ से बतियाती
नाचती हथेलियाँ, खनकती चूड़ियाँ, जवें बनाती
गूँजती दादा की आवाज़ आती..." मैं निकलता हूँ भाई
शाम को हाट में जाना है , बता दो क्या क्या सौदा लाना है
नौकर आकर पर्चा थमाता
जनेऊ संभालते बाबा को कुछ याद आता
छड़ी घूमते, ख़ुद बतियाते, उपर आते..
गंभीर शकल में बद माशी छुपाते
सर-हाने मेरे छड़ी उठाते और गुड़गूदी मचाते
"भोंधू भाई उठ जाओ, कभी तो हमसे भी बतियाओ"
आवाज़ दोनो की घर को गूँजाती
सब से बेख़बर कज़ियारी
धूपे में मसाले सुखाती
लाल पत्थर के खंबों से झाँकती तुलसी
दादी के जलाए दिए को हवा से बचाती
कुछ tutlaati मैं भी आती
माँ जी 'भापा' करके चिल्लाती
दादी के लाड प्यार में मेरा
नखरा भर-भर चलता था
बिन दातून, बिन मुह धोये भी
सब कुछ खाना मिलता था
आस पास में सभी दादी, ताई बन जाती
शाम को दादी मेरी रोज़ मुझे सजाती थी
वो हरा सा lahnga मेरा, वो चाँदी के जेवर सारे
पहना कर दादी मुझको, पल्लू में हँसती छुपाती थी
सात बजे शाम को रात आधी लगती थी
अधूरी कहानी पिछले दिन की
दादी फिर पूरी करती थी
आधी कहानी फिर से एक बार,
अगले दिन के लिए बच जाती थी.
धूप बाहर को लटकी सी ,
पास की भट्टी, ताज़ी आग से भरी
मूंगफली की महक बहाती थी.
आँगन में दादी, माँ से बतियाती
नाचती हथेलियाँ, खनकती चूड़ियाँ, जवें बनाती
गूँजती दादा की आवाज़ आती..." मैं निकलता हूँ भाई
शाम को हाट में जाना है , बता दो क्या क्या सौदा लाना है
नौकर आकर पर्चा थमाता
जनेऊ संभालते बाबा को कुछ याद आता
छड़ी घूमते, ख़ुद बतियाते, उपर आते..
गंभीर शकल में बद माशी छुपाते
सर-हाने मेरे छड़ी उठाते और गुड़गूदी मचाते
"भोंधू भाई उठ जाओ, कभी तो हमसे भी बतियाओ"
आवाज़ दोनो की घर को गूँजाती
सब से बेख़बर कज़ियारी
धूपे में मसाले सुखाती
लाल पत्थर के खंबों से झाँकती तुलसी
दादी के जलाए दिए को हवा से बचाती
कुछ tutlaati मैं भी आती
माँ जी 'भापा' करके चिल्लाती
दादी के लाड प्यार में मेरा
नखरा भर-भर चलता था
बिन दातून, बिन मुह धोये भी
सब कुछ खाना मिलता था
आस पास में सभी दादी, ताई बन जाती
शाम को दादी मेरी रोज़ मुझे सजाती थी
वो हरा सा lahnga मेरा, वो चाँदी के जेवर सारे
पहना कर दादी मुझको, पल्लू में हँसती छुपाती थी
सात बजे शाम को रात आधी लगती थी
अधूरी कहानी पिछले दिन की
दादी फिर पूरी करती थी
आधी कहानी फिर से एक बार,
अगले दिन के लिए बच जाती थी.
मंगलवार, 30 जनवरी 2007
खोने का दर्द
Snippets
क़यामत -
शाम-ए-ग़म
जाम-ओ-मीना
दर्द -ए-दिल
इंतिहा उस पर
वस्ल मुश्किल
*~*~*
सादगी अहसास की -
तस्वीर ने उनको देखा
हया से रंग बदल गये
*~*~*
रंगो की दुनिया -
रंग ख़ामोशी के!!
किसी दुल्हन को देखा था..
*~*~*
असर -
सोहबत में हम तो क्या
मौसम बदल जाते हैं
*~*~*
मुट्ठी भर आसमान और चुटकी भर ज़मीन
कुछ हवायें, चंद बूँदे
और ज़रा सी आग..
ये सब है मेरी कमाई
जो मैने इस ज़िंदगी से पाई
*~*~*
शाम-ए-ग़म
जाम-ओ-मीना
दर्द -ए-दिल
इंतिहा उस पर
वस्ल मुश्किल
*~*~*
सादगी अहसास की -
तस्वीर ने उनको देखा
हया से रंग बदल गये
*~*~*
रंगो की दुनिया -
रंग ख़ामोशी के!!
किसी दुल्हन को देखा था..
*~*~*
असर -
सोहबत में हम तो क्या
मौसम बदल जाते हैं
*~*~*
मुट्ठी भर आसमान और चुटकी भर ज़मीन
कुछ हवायें, चंद बूँदे
और ज़रा सी आग..
ये सब है मेरी कमाई
जो मैने इस ज़िंदगी से पाई
*~*~*
रविवार, 28 जनवरी 2007
माध्यम - Medium

चार आँखें, एक चाहत
एक ख्वाब, एक हक़ीक़त
चाही उन्होने, माँगी उन्होने
देखा तूने, सुना तूने
दिया तूने, पाया उन्होने
और माध्यम .......... मैं
दो छोटे हाथ, एक छोटी दुनिया
छोटी दुनिया में छोटा सा सपना
'उंगलियाँ छोटे हाथो की थामें
उंगलियाँ और भी छोटे हाथों की'
दुआ थी, हुआ भी
चाहा उसने, माँगा उसने
देखा तूने, सुना तूने
दिया तूने, पाया उसने
और माध्यम ............. मैं
जब बड़ी हो रही थी उंगलियाँ
उन सबसे छोटे हाथो की
साथ बढ़ रही थी लकीरें
उन हथेलियों की
लकीरें समेत कर
एक दिन मुट्ठी बना कर
मली जब आखें उसने
तो देखा सामने दुनिया थी
हँसते चेहरे, बनते चेहरे
टूटते चेहरे,आलमस्त चेहरे
कुछ की उम्मीद, कुछ की हँसी
कुछ की आस, कुछ का साथ
चाहा उन्होने, माँगा उन्होने
देखा तूने, सुना तूने
दिया तूने, पाया उन्होने
और माध्यम ......... मैं
लकीरें अब भी बढ़ रही थी
ख़ुद का रास्ता ढूँढ रही थी
एक mrigtrishna, एक झंझावत
एक तूफ़ान , एक शांत झील
एक नया रूप लेता खंडहर
सब मिले रास्ते में.. मुझे
मैं .... तेरा हिस्सा
जानती हुईं एक दिन
मिल जाएगा ये हिस्सा तुझमें
और माध्यम मैं
विलीन हो जाओंगी तुझमें
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